Tuesday, October 25, 2011

दिए की रौशनी से सब अँधेरा दूर हो जाये

दिए की रौशनी से सब अँधेरा दूर हो जाये ,
जो दिल में ख्वाहिशे हो वो सभी मंजूर हो जाये
जो अब तक बात दिल में है उसे बहार निकालने दो
जाने कौन सी हो बात जो मशहूर हो जाये

दिए की लौ जरा जलकर निखर जाये तो चलता हूँ ,
वो उनका चाँद सा चेहरा नज़र आये तो चलता हू
सुना है की नज़र उनकी क़यामत है तो होने दो ,
नज़र उनकी इधर एक बार जाये तो चलता हू

हमे कुरता पहनना था बड़ी अच्छी हिदायत है ,
मज़ा तो तब था जब की आप भी घाघरा सिला लेते
महक चारो तरफ बहती चमक चारो तरफ रहती ,
रंगोली ही सजा लेते की कुछ दीपक जला लेते

बुझे चेहरे नज़र मायूश लव खामोश है देखो,
अरे सब साथ आ जाते तो महफ़िल ही सजा लेते ॥
हमे रुकने की जिद है और उन्हें चलने की बेताबी,
की मुंह मीठा करा देते की मुंह मीठा करा लेते ॥

Thursday, September 8, 2011

गुलाबों सा कोई मौसम

गुलाबों सा कोई मौसम, तुम्हे मिलने चला आये ।
उड़े बादल कहीं से मेघ बन, जुल्फों पे छा जाये ॥
मुबारक हो ये दिन खुशियाँ मिले, ये है दुवा रब से ।
कि मेघा हो सभी मौसम, तुम्हे मिलकर बता जाए ॥

कि आकर चाँद, तेरे चाँद से, चेहरे से मिल जाये ।
कि तुम को देख कर, सिमटी हुई कलियाँ भी खिल जाये ॥
छटा है इन्द्रधनुषी, और मौसम भी सुहाना है ।
तो क्या हो अब अगर मेघा कही घर से निकल आये ॥

सभी तारे खड़े है राह में तुमको सजाने को ।
कि जुगनू भी चमकते है तुम्हे राहें दिखाने को ॥
कि मंदिर कि कोई मूरत हो तुमको ढूढ़ते है सब ।
उसी रस्ते पे आये है 'अनिल' मंदिर बनाने को ॥

Thursday, September 1, 2011

तुम्ही तो विघ्नहर्ता हो

तुम्ही तो विघ्नहर्ता हो, तो सारे विघ्न हर लेते ।
दयासागर हो तुम थोड़ी, दया हम सब पे कर लेते ॥

कि सब कुछ हो सुहाना, और सब में प्रेम हो घर घर ।
कि होली, ईद, दीवाली, ये सब कुछ साथ कर देते ॥

यही विनती, निवेदन है, यही है प्रार्थना मेरी ।
कि मेरे घर में रह लेते, या अपने घर में रख लेते ॥

Tuesday, August 30, 2011

मना ली एक दिन पहले ही

मना ली एक दिन पहले ही मैंने, ईद पूछो क्यूँ ।
अरे ! वो दूसरी मंजिल पे, मैंने चाँद देखा था ॥
बड़ा ही खूबसूरत था, बड़ी थी सादगी उसमे ।
बड़े नजदीक थे उसके, 'अनिल' जब चाँद देखा था ॥



Wednesday, August 24, 2011

जश्ने नौरोज़ के

जश्ने नौरोज़ के दिन आपको आना होगा ।
हटा के ज़ुल्फ़ महताब दिखाना होगा ॥

रुख को परदे में छुपाने की आदत नहीं अच्छी ।
हटा नकाब तुम्हे बज़्म में आना होगा ॥

लवों को सी के न बैठो खुदा के वास्ते तुम ।
सरे महफ़िल में तुम्हे नज़्म सुनाना होगा ॥

फुल जुल्फों में पिरोये है क्या कयामत है ।
आपको रोज़ इस जलवे को दिखाना होगा ॥

कही ऐसा न हो मिल पाए न सहर मुझको ।
आखिरे शब् में रूखे चाँद दिखाना होगा ॥

मैकशे जाने की आदत ख़राब लगती है ।
लाले मुज़ब लव का पैमाना पिलाना होगा ॥

जाने निगार रूबरू होने में खलिश है ।
निगाहे नाज़ से मुस्कान पे आना होगा ॥

ज़रिह बन के रह गयी है जिंदगी मेरी ।
सजदे में अनिल तुमको भी आना होगा ॥

( ०२ -०९ - १९९९ )

हम इश्क महफ़िलो

यूँ तो रोते है हम शामों सहर लेकिन ।
हम अश्क सरे आम बहाया नहीं करते ॥

ये उनकी खूं है देकर जख्म हम पे मुस्कुराते है ।
जख्मों पे हम भी मरहम लगाया नहीं करते ॥

निगाहें परवरिश के वास्ते बैठे तो कब तलक ।
पत्थर दिल तब्बसुम पे आया नहीं करते ॥

फितरतों में उनकी शामिल है क़त्ल करना ।
हम खूने जिगर अपना दिखाया नहीं करते ॥

उनकी तो ये आदत है मिल करके भूल जाना ।
हम लव से लेके नाम भुलाया नहीं करते ॥

हम दिल में बसाते है अपने यार की सूरत ।
तस्वीर आइनों में सजाया नहीं करते ॥

वो घर उजाड़ सबकी पिलाते शराब है ।
हम पीने कभी मैकदे जाया नहीं करते ॥

दुनिया से जी है भर गया अब जी के क्या करे ।
हम लाशों का मुज्जसम बनाया नहीं करते ॥

ये जिंदगी ही बोझ मेरे दोस्तों सुनो ।
हम कांधों पे अपने बोझ उठाया नहीं करते ॥

(१५ - ०८ -१९९९ )

Tuesday, August 23, 2011

हमने थे होश खोये

हमने थे होश खोये, उनके रूबरू होके ।
उनके भी कदम बहके, तो क्या मेरी खता है ॥
परदे में रुख छिपाए है, ये कैसा प्यार है ।
पल्लू जो सर से सरका, तो क्या मेरी खता है ॥

मेहँदी लगायी पैरों में, तो फूल हँस पड़े ।
बोसा लिया था फर्श ने, तो क्या मेरी खता है ॥
बन चौहदवीं का चाँद, न निकला करो छत पर ।
टकराए कोई बादल, तो क्या मेरी खता है ॥

बिखराई तुमने जुल्फे, मै समझा कि चाँद डूबा ।
तेरा साया मैंने देखा, तो क्या मेरी खता है ॥
लव खुलते ही गिरे थे, फूलों के कई गुच्छे ।
एक मैंने भी उठाया, तो क्या मेरी खता है ॥

ऐसे न सज सवंर कर, तुम अंजुमन में निकलो ।
टकराए कोई आशिक, तो क्या मेरी खता है ॥
तेरे लव को देख कर के, भवरें है कई मचले ।
तेरे लव पे आके बैठे, तो क्या मेरी खता है ॥

अंगड़ाई ना लिया करो, तुमको कसम हमारी ।
फिर तुम ना मुझसे कहना, कि ये मेरी खता है ॥

(०३ - ०४ - २००० )

हमने थी कसम खायी

हमने थी कसम खायी, तुमसे न मिलेगे ।
गर ख्वाब में मिल जाएँ, तो कोई क्या करे ॥
पीने कि है पाबन्दी, हरगिज न पियेंगे ।
जब खुद ही जाम छलके, तो कोई क्या करे ॥

उनकी ये आरज़ू थी, हम घर न रहेगे ।
जब दिल ही आशियाँ हो, तो कोई क्या करे ॥
अपनी ये तमन्ना थी, कुछ गुफ्तगू करेगे।
चिलमन न उठा शब् भर, तो कोई क्या करे ॥

सोचा था हम न रुसवां, दिलदार को क़रेगे ।
परवान मोहब्बत चढ़ी, तो कोई क्या करे ॥
मालिक मेरे ये कैसी, उलझन में फंस गया ।
उलझन उलझती जाये, तो कोई क्या करे ॥

शिकवा करेगें किस से, ए मेरे हमनशीं ।
जब जिंदगी हो कातिल, तो कोई क्या करे ॥
हमने किया है वादा, उनसे इंतज़ार का ।
गर वो ही रूठ जाये, तो कोई क्या करे ॥

हम दास्ताँ सुनाये जाकर, किसे 'अनिल' ।
जब हम ही दास्ताँ है, तो कोई क्या करे ॥
हमने थी कसम खायी, कि हम कुछ न कहगे ।
आहिस्ता खुल गए लव, तो कोई क्या करे ॥

(०३-०४-२००० )

Wednesday, August 17, 2011

एक मुद्दत से इंतजार है

एक मुद्दत से इंतजार है, कुछ बोलेंगे ।
देर से ही सही गुलाब से, लव खोलेंगे ॥

कुछ तो एहसास करते, देखते, मुस्कुरा देते ।
फिर से जुल्फों को, अपने चेहरे पे गिरा देते ॥

हम तो कब से खड़े है राहों में, इंतज़ार है ।
न जाने क्यों ये दिल, इतना बेकरार है ॥

सोचते है जो बची है, वो गुज़र जाये ।
मै चलू उसपे, जो डगर तेरे घर जाये ॥

ये इतनी देर, बहुत देर हो न जाये कही ।
मेरी किस्मत हो, ये किस्मत खो न जाये कहीं ॥


Sunday, August 14, 2011

माँ का श्रृंगार

माँग में भरना धूल हिंद की, जिसमे रवि की लाली हो ।
घुघराले बालों में बेंदी, चाँद सितारा वाली हो ॥
माथे पे बिंदिया सूरज की, जिसमे चिन्ह शेर का हो ।
आँखों में पुष्कर तीरथ और, वक्ष्स्तल अजमेर का हो ॥

काबा हो जिसकी पलकों पर, जिसका ह्रदय शिवाला हो ।
वाणी गीता सी पवन हो, हाथ में मणि की माला हो ॥
बनी तिरंगे की चूनर, और सिर पर मुकुट गगन का हो ।
भगत सिंग सा बासंती तन, जिसमे रंग लगन का हो ॥

चोली में चरखा बनवाना, जिस पर पड़ा दुशाला हो ।
ताजमहल से सुन्दर तन पर, कपड़ा खादी वाला हो ॥
चक्र करधनी में बनवाना, कर में विजय तिरंगा हो ।
धवल वेग जिसका, जिसकी बाहों में पवन गंगा हो ॥

आँचल में भर हिंदी सागर, पायल पटना की लाना ।
वीर जवाहर का रंग भी, तुम सभी जगह पर भरवाना ॥
आँखों में झरिया का काजल, नथ चित्तौड़ किले की हो ।
शुभ्र शीश पर नग हिमगिरि, चूड़ामणि बंग जिले की हो ॥

घंघरा गाँधी वाला जिसमे, वन्देमात्रम बूटा हो ।
लाल बहादुर का रंग भरना, कोई भाग न छूटा हो ॥
सारी बनी बनारस की और, ज़री हैदराबादी हो ।
हर धागा जिसका बतलाता, सौ करोड़ आबादी हो ॥

अर्जुन सी हुँकार, तांडव झासी की रानी जैसा ।
रक्षक जिसके वीर शिवाजी, उस सरहद को डर कैसा ॥
नलवे का रंग गहरा कर, संगीन थमाना बाहों में ।
फूल तोड़ लखनऊ शहर के, बिखरा देना राहों में ॥

कर श्रृंगार सजाकर उसको, कर देना तुम सिंह सवार।
तब जाकर कहलाएगी वो, भारत भू का शुभ अवतार ॥

(१५ अगस्त १९९९ - दिन रविवार )





चलो मस्त तुम तो धरा डोल देगी

चलो मस्त तुम तो धरा डोल देगी ।
अगर तुम हुंकारों चिता बोल देगी ॥

बनो निश्चयी प्रात को वश में कर लो ।
बनो भास्कर रात को वश में कर लो ॥

कि तुम भोर के दीप बनकर न बैठो ।
कि झिलमिल सितारों को आँचल में भर लो ॥

बनो विक्रमी एक संवत चला दो ।
कि तुम एक होली नयी फिर जला दो ॥

अगर मौन बन करके आघात खाए ।
तो धिक्कार तुम इस धरा पे क्यों आये ॥

बनो साहसी सेतु सागर पे बाँधो ।
समुन्दर कि लहरों को तुम दास कर लो ॥

धरा तो तुम्हारे बहुत सन्निकट है ।
गगन, रश्मियाँ, रवि को तुम पास कर लो ॥

तो तुम युग प्रवर्तक कि मूरत बनोगे ।
तो तुम मेरु गिरि कि तरह फिर तनोगे ॥

स्वयं आके घन तुम पे बरसायेगा जल ।
है बहुमूल्य तेरा दिवस, रात्रि, क्षण, पल ॥

कि पुरुषत्व ललकार पर ना भुलाना ।
कि अमरत्व जीवन में लेकर न आना ॥

तभी कौरवो को पराजित करोगे ।
तभी तीर तुम तरकशो में भरोगे ॥

कि हाथो से नित तू प्रलय का सृजन कर ।
कि फिर से कमंडल में संजीवनी भर ॥

कि तू भाग्य का जा स्वयं बन विधाता ।
तो फिर देखना कौन सम्मुख है आता ॥

(०५-०६-२०००)

शहीदों को झुकावो सिर

शहीदों को झुकावो सिर, जवानों ने ये गया है ।
लगावो धूल को सिर पर, वतन में चैन आया है ॥

वो बिस्मिल थे, भगत सिंह थे, ज़मीं को दे लहू अपना ।
जिन्होंने वर्षो देखा था, अनोखे देश का सपना ॥

फूल सर का अशफ़ाक ने, इस पर चढ़ाया है ।
शहीदों को झुकावो सिर, जवानों ने या गया है ॥

शहीदों ने सजायी माँग माँ की, खून देकर के ।
चुका सकते नहीं एहसान, ये सौ बार भी मर के ॥

खबर तुमको नहीं हमने क्या खोया और पाया है ।
बहुत ही बार हमको, दुश्मनों ने आजमाया है ॥

कसम हमको मरे हम, देश की खातिर वतन वालो ।
तुम्हे आवाज़ माँ देती है तुम सीमाए संभालो ॥

सिकंदर को हमी पोरश ने, झेलम से भगाया है ।
शहीदों को झुकावो सर, जवानों ने ये गया है ॥

हमे है दोस्त प्यारे साथ में, दुश्मन भी प्यारे है ।
हमारी दोस्ती और दुश्मनी, के नुस्खे प्यारे है ॥

करोगे प्यार से बातें, करेगें बात हम प्यारी ।
मगर सुन लो हमे चेतावनी, बिलकुल नहीं प्यारी ॥

अरोड़ा ने नियाजी को, सबक अच्छा सिखाया है ।
शहीदों को झुकावो सिर, जवानों ने ये गया है ॥

(१२-०२-१९९९)

Saturday, August 13, 2011

अनुपम तुम्हारे

अनुपम तुम्हारे रूप को निहारता रहा
कितने रवि शशि मै तुम पे वारता रहा

तुम हो इसी जगत की रचना ये ज्ञात होता
दिनकर के निकलने से पावन प्रभात होता

'अनिल'
तुम्हारे रूप को सवारता रहा
अनुपम तुम्हरे रूप को निहारता रहा

पूनम तुम्हारे केश गूंथती उछाह ले
उषा लगा रही है महावर क्या चाह ले

तारो के जितनी आयु हो यौवन खिला कमल
किसने तुम्हारी की है रचना विमल विमल

तेरा रूप प्रेम सिन्धु में पखारता रहा
अनुपम तुम्हारे रूप को निहारता रहा

तिरंगे की कसम हमको

तिरंगे की कसम हमको, तिरंगा झुक नहीं सकता ।
उठा दुश्मन की खातिर जो, कदम वो रुक नहीं सकता ॥

तिरंगे को भगत सिंह ने, सजाया खून से अपने ।
तिरंगा हाथ में लेकर, बने जय हिंद के सपने ॥

अगर शान-ए-तिरंगा पर, कोई दुश्मन नज़र डाले ।
शपथ है पूर्वजों की, खाक में उसको मिला डाले ॥

नहीं कुर्बानियां भूले है, बिस्मिल की, जवाहर की ।
अभी तक आ रही खुशबु, है झासी के महावर की ॥

नहीं सुखा लहू अब तक, हिमालय की भुजावों ।
नहीं ठंडा हुवा है रक्त, अब तक रह्नुमायों का ॥

निशां आज़ाद भारत का, तिरंगा है तिरंगा ।
हमारे देश की है शान, लहराता तिरंगा ॥
भले ही हिंद के रणबाकुरे, गिन गिन के मर जाये ।
मगर हिमराज पे लहराएगा, प्यारा तिरंगा ॥

(११-०८-१९९९)

ह्रदय में टीस सी होती (२०-०७-१९९९)

ह्रदय में टीस सी होती , दिशा में क्यों निशा सोती ।
श्रवण को भेदता क्रंदन, खड़ी ममता विलग रोती ॥

कहाँ खोया मेरा सिंदूर, खोया है कहा दिनकर ।
कहाँ खोया है माँ की, गोद में रणबाकुरा छिप कर ॥

कहीं राखी गिरे हिलकर, भरे सिसकारियाँ बहना ।
मगर रोती हुई बहना, का बस इतना ही है कहना ॥

कहीं ललकार दुश्मन, मारता हो गया मेरा भैया ।
लगा हुँकार अरिमर्दन बना, हुंकारता भैया ॥

विजय के साथ लौटा है , विजय लेकर विजय नारा ।
खड़ी पगदंदिया ताके , विजय जिस आँख का तारा ॥

लगा कर शीश पर चन्दन, चढ़ाया शीश का चन्दन ।
तेरा शत कोटि अभिनन्दन, तेरा शत कोटि पग वंदन ॥

जहाँ पुरुषत्व ललकारे , विदारे शत्रु को उस क्षण ।
यहाँ हर उर में गीता है, है पावन भूमि का कण कण ॥

यही गौरव हमारा भाल, भाले की सदृश रहता ।
पुरातन से रचा इतिहास , दुहराता यहाँ रहता ॥

उठाये सैकड़ो हिमगिरी है, अपने नख विशालो पर ।
लिए है सैकड़ो गंगा, नवीनी के रसालो पर ॥

मिटा सिंदूर अपना है लगाती, टीका सिंदूरी ।
उठा तलवार देती, भेजती जा कर कसम पूरी

यहाँ रोती नहीं माएं, पिता को गर्व होता है।
यहाँ का बच्चा बच्चा, खेत में बन्दुक बोता है ॥


हम तमाशा बन गए उनका

हम तमाशा बन गए, उनका तमाशा देख कर ।
बातों ही बातों में मेरा, चाक दामां हो गया ॥
इस कदर वो अंजुमन में, लौटकर आई 'अनिल' ।
देखते ही देखते, रंगीन शामां हो गया ॥

मेरी गुस्ताखी थी लाज़िम, गुफ्तगू करने लगे ।
मुख़्तसर पर आये थे, और राजनामा हो गया ॥
लब्ज़ मुँह से एक न निकला, पर नज़र सब कह गयी ।
मैंने देखा उनका चिलमन, लाल जामां हो गया ॥

हम झुके उनकी कदम बोस़ी, को जाने मुन्तज़र ।
मेरे दिल से उनके दिल का, बायनामा हो गया ॥
मैंने उनको नूर-ए-जन्नत समझ, सिज़दा किया ।
मै मगर उनकी नज़र में, खानशामा हो गया ॥


Tuesday, August 9, 2011

मेरी किस्मत बना सकते है

मेरी किस्मत बना सकते है, पर वो क्यों बनायेगे ।
मेरी दुनिया सजा सकते है , पर वो क्यों सजायेगे ॥
मेरे हालत बन सकते है , बस नज़रे उठा दे वो ।
मगर उनको रुलाना है , रुलाते है, रुलायेगे ॥

कि कब तब तुम न बोलोगे, ये हम अब देख ही लेगे ।
कि हम आवाज़ देगे, और तुमको आजमायेगे ॥
कि आ जावो है दम रुकता, नज़र बहकी न जाने क्यों ।
हम इतनी दूर जायेगे, बुलाने पर न आयेगे ॥

Sunday, August 7, 2011

हाले दिल जब भी सुनते है उन्हें

हाले दिल जब भी सुनाते है उन्हें ।
देख कर वो मुस्कुराते है हमे ॥
भूलना हम चाहते है उनको जब ।
तब वो हरदम याद आते है हमे ॥

देखने को हम उन्हें बेज़ार है ।
वो न जाने क्यों सताते है हमे ॥
ठीक है उनकी अदा देखेगे हम ।
पूछेगे क्यों आजमाते है हमें ॥

क्या करे उस चाँद के दीदार को ।
बोलते ही चुप कराते है हमे ॥
जब भी पूछो कब मिलोगे, ईद में ।
इस तरह से अब बताते है हमे ॥

Friday, June 10, 2011

तमन्नावो का क्या है

तमन्नावो का क्या है, वो मचलती है मचलने दो।
शमा को रोकना क्या, काम जलना है तो जलने दो ॥
तो अब हम आज देखेगे, कि उनका फैसला क्या है ।
नज़र के तीर चलते है, जो चल जाये तो चलने दो ॥

न जाने क्यों उन्होंने रोक रक्खी है, मेरी धड़कन ।
तो बस अब ठीक है, तूफान पलते है तो पलने दो ॥
न बोलेगे अभी कुछ, और ना कुछ बोलने देगे ।
अरे अब सांस रुक जाए, निकलती जां निकलने दो ॥

Saturday, May 28, 2011

वो उनके चाँद से चेहरे

वो उनके चाँद से चेहरे पे तिल है क्या क़यामत है ।
जिसे देखो वही कहता है की उनसे मोहब्बत है ॥
वो इतनी सादगी से मुसुकुराते है की मत पूछो ।
नहीं उनको पता है की वो कितनी खुबसूरत है ॥

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मेरे बिगड़े हुवे हालात है मजबूरिया भी है ।
की मंजिल पास दिखती है मगर कुछ दूरियां भी है ॥
उन्हें फुर्सत नहीं है की वो मतलब खुद समझ लेते ।
नहीं आता है समझाना की कुछ कमजोरिया भी है ॥

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कभी कुछ बात कह देते कभी कुछ बात सुन लेते ।
भरोसा जिंदगी का कुछ नहीं हालात सुन लेते ॥
मेरी मजबूरियों से कब तलक नज़रे चुरावोगे ।
की कुछ जज़्बात कह देते की कुछ ज़ज्बात सुन लेते ॥

Sunday, May 22, 2011

कभी कुछ बात कह देते

कभी कुछ बात कह देते, कभी कुछ बात सुन लेते ।
भरोसा जिंदगी का कुछ नहीं, हालत सुन लेते ॥
मेरी मजबूरियों से कब तलक, नज़रे चुरावोगे ।
कि कुछ जज़्बात कह देते, कि कुछ जज़्बात सुन लेते ॥

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वो चाँद देखने कि हसरत थी, कई दिन से ।
एक बार जरा चेहेरे से, जुल्फों को हटा लेते ॥
नजरो को उठाते जरा, आहिस्ता से कुछ ऊपर ।
एक बार देख लेते कुछ, मुस्कुरा ही देते ॥

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सितारों कि कमी तुमको नहीं ये जानता हू मै ।
बहारो कि कमी तुमको नहीं ये मानता हू मै ॥
मगर वो रौशनी हो तुम जो रोशन जिंदगी कर दे ।
यकी कर लो तुम्हे तो दूर से पहचानता हू मै ॥

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कोई ख़ुशी न थी, तो कोई गम भी तो न था ।
उन्हें देखना किसी जन्नत से कम भी तो न था ॥
मुझे कभी किसी का इंतजार न था पर अब है ।
कुछ अधूरा सा लगता है ये पहले तो न था ॥

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महकती हवा आ रही है किधर से ।
ये खुशबु तुम्हारी क्या पहचानती है॥
न नज़रे चुरावो न नज़रे झुकावो ।
हवा तो हवा है ये सब जानती है ॥

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हमारी बात कब तक जाएगी उन तक खुदा जाने ।
कि लब सी के है बैठे न जाने क्यों खुदा जाने ॥
कि कितनी मुश्किलो पे वो हसे थे याद है मुझको ।
मगर अब कुछ नहीं कहते हुवा ये क्या खुदा जाने ॥

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हर एक बात पे कहते है कि मतलब क्या है ।
कोई बताये जरा रह कोई अब क्या है ॥

Sunday, April 24, 2011

जब भी मै कुछ बोलता

जब भी मै कुछ बोलता हू चुप करा देते है वो ।
इस तरह हर बार मै कुछ बोल ही पता नहीं ॥
देखता जाता हू उनकी नज़र रूकती है कहा ।
चाहता हू कुछ कहू मुह खोल ही पता नहीं ॥

जानते है वो मगर अंजान हो जाते है क्यों ।
छुप गए है और मै अब ढूढ़ ही पता नहीं ॥
चाहता हू मै कहू कुछ होठ हिलते ही नहीं ।
मुस्कुराते है मगर क्यों जान ही पता नहीं ॥

कोई कह दे उनसे की जुल्फे हटा ले अब जरा ।
क्या करेगी ये मुझे कुछ तो समझ आता नहीं ॥
अब नज़र उठती नहीं है देख कर उनको 'अनिल' ।
चाहता हू बोल दू पर कुछ कहा जाता नहीं ॥

रास्ते मिलते है पर

रास्ते मिलते है पर, अब मंजिले मिलती नहीं ।
लोग मिलते है मगर, अब महफिले मिलती नहीं ॥
क्या पता किस दिन मै, उनसे बोल पाऊ हाले दिल ।
वो तो मिलती है मगर, अब वो गले मिलती नहीं ॥

कोशिशे की थी कि, कुछ तो साथ आएगा मेरे ।
जानता था पर नहीं, कुछ हाथ आएगा मेरे ।।
जिन्दगी चलती रही, पर रास्ते रुकते गए ।
पर न था मुझको पता, ये हाथ आएगा मेरे ॥

Saturday, April 16, 2011

छोड़िये उलझने

छोड़िये उलझने, आज की आज पर ।
कुछ इधर देखिये, जुल्फ सुलझाइए ॥
पर नज़र उलझती है, तो उलझी रहे ।
छोड़िये, अब जो उलझी है उलझाइये ॥

कुछ शमा बांधिए, कुछ नए गीत हो ।
आ गए है तो फिर, कुछ ठहर जाइये ॥
साज को देखिये, गीत को साथ ले ।
गीत क्या चीज है, गीतिका गाइए ॥

दिल में बाते बहुत है, मगर क्या कहू ।
और कैसे कहू, कुछ तो बतलाइए ॥
रंगे खुशबु गुलाबो, की मिलती रहे ।
सब के चेहरे पे है, हर्ष दिखलाइये ॥

दिल मचलते रहे, यू ही मिलते रहे ।
फूल खिलते रहे, ऐसा कुछ लाइए ॥
बात कुछ भी रहे , साथ कुछ न रहे ।
हर्ष ले जाइये , हर्ष दे जाइये .......... ।

जरुरी ये नहीं कि हमने

जरुरी ये नहीं, कि हमने कितनी बार देखा है ।
जरुरी ये है, कि उनकी भी नज़रे कुछ इधर आये ॥
हमारी आदतों में ये है शामिल रुक के चल देना ।
ये उनकी आदतों में हो तो फिर कुछ बात बन जाये ॥

नतीजा जनता हू मै, मगर एक्जाम देने दो ।
खुदा जाने सवालो का कोई हल फिर निकल आये ॥
कि ख्वाबो में न कोडिंग हो वह परिया दिखाई दे ।
कि हो सकता है ख्वाबो में मेरी किस्मत बादल जाये ॥

Friday, March 18, 2011

बड़े अरमान है की मखमली

बड़े अरमान है की मखमली गालो को रंग डालू ।
की वो हँसते रहे हँसते हुवे उनपे मै रंग डालू ॥
की ख्वाबो की कोई ताबीर हो जाती है होने दो ।
वो मुझको अपने रंग दे दे मै उनपे अपने रंग डालू ॥

जो है अरमान पिछले अबकी होली में मिटा लेना ।
की उनके मखमली गालो पे थोडा रंग लगा लेना ।।
अगर शर्मा रहे है तो कोई अब बात मत करना ।
मचलती जुल्फ पर उनके कोई महफ़िल सजा लेना ॥

की उनके रंग सा अपना कोई रंग तुम मिला लेना ।
जो हो दस्तूर होली के वो सब मिल कर निभा लेना।।
हमारा क्या है हम अनजान है मत जानना हमको ।
की जब सब कुछ पता हो जाय तो हमसे बता लेना ॥

खबर अब पूछने की क्या जरुरत है की होली है ।
जो मेरे साथ थी अब तक वो उनके साथ होली है ॥
ये है दस्तूर मिलते है गले सब भूल कर शिकवे ।
अगर उनसे न मिल पाए यू होली पे क्या होली है ।।

अगर इस बार होली में गले मिल लो तो क्या होगा ।
मचलती जुल्फ में अरमान तुम भर लो तो क्या होगा ॥
अनिल रहने भी दो महफ़िल में आये है वो शर्मा के ।
इशारो से सही एक बार कुछ कर दो तो क्या होगा ॥

Sunday, February 13, 2011

मै ये तो जनता हू

मै ये तो जनता हूँ एक दिन समझेगे वो मुझको ।
मगर कब तक निहारेगा कोई मंजिल खड़ी होगी ॥
कही पर वो खड़े होगे कही पर हम खड़े होगे ।
रहेगे साथ पर जाने कोई उलझन पड़ी होगी । ।

कई मजबूरिया होगी कोई मौसम नया होगा ।
कदम चाहेगे चलना पर कोई बेडी पड़ी होगी ॥
मै यू तो पार कर जाउगा सारे गम ज़माने के ।
मगर ना था पता की सामने तू भी खड़ी होगी॥

नज़र में कुछ नया होगा डगर भी तो नयी होगी ।
जिसे मै ढूढ़ता हू आज तक वो कल कही होगी ॥
कोई मौसम नहीं हू जो मै कुछ दिन में बदल जाऊ ।
यही पर मै खड़ा हू याद ये उनको कभी होगी ॥

Tuesday, January 25, 2011

६२व गद्तंत्र दिवस

हर साल २६ जनवरी आती है और चली जाती है । यू तो पता ही न चले कब आई कब गयी लेकिन भला हो कि दो चार दिन पहले से देश भक्ति के गीत स्कूल वगैरह से सुनाई देने लगते है और दूसरा ऑफिस कि छुट्टी । आज कल किसी को इतना वक़्त ही कहा है कि ये सब याद रखे । किसी को फुरसत ही नहीं है कि रोजी रोटी से हट कर सोचे और सोचे भी कैसे पीछे पूरे परिवार कि चिंता जो नहीं है । ऐसा नहीं है कि उनमे देश के लिए भक्ति नहीं है , सम्मान नहीं है सब कुछ है लेकिन टाइम नहीं है।
अब आप कहेगे कि आज़ादी कि लड़ाई लड़ने वाले लोगो के परिवार नहीं था उन्हें उसकी चिंता नहीं थी । आपका सवाल अपनी जगह सही है। दरअसल उन्हें गुलामी विरासत में मिली थी और वो उसके खिलाफ लड़ रहे थे । और आज विरासत में आज़ादी मिली है जिसका वो आनंद उठा रहे है । वो कहते है न जब तक ठोकर न लगे इन्सान संभलता नहीं है तो हो सकता है किसी ठोकर के इंतजार में हो । आज तो पैदा होते या यू कह दीजिये कि पैदा होने से पहले ही माँ बाप सोच लेते है कि मेरा बेटा डॉक्टर बनेगा इंजिनियर बनेगा वगैरह वगैरह आज कोई नहीं कहता कि वो गाँधी , नेहरु भगत सिंह बनेगा । मै ये नहीं कहता कि ये उनकी गलती है लेकिन कही न कही कुछ तो कमी है । कुछ संस्कार का असर तो पड़ता ही है । क्यूकि संस्कार और संगती आदमी को क्या से क्या बना देती है । एक उदहारण के लिए जब धुल हवा के साथ होती है तो आसमान में ऊपर उठती चली जाती है और जब पानी का साथ उसे मिलता है तो कीचड़ बन जाती है ।
अभी हमारे प्रदेश के मुख्यमत्री का जन्म दिन था । पूरा लखनऊ नीली रौशनी से नहा रहा था । हर चौराहों को नीली झालरों से सजाया गया था । ऐसा लगता था मानो हर चौराहे पर नीले कमल उलटे कर के रख दिए गए है। मै नहीं कहता कि ये गलत है अरे भाई ये प्रदेश के मुख्या मंत्री का जन्म दिन था तो ये सब तो होना ही चाहिए । लेकिन जब कि आज २६ जनवरी है देश के लिए बहुत बड़ा दिन है । तो इस अवसर पर कुछ सरकारी इमारतों पर ही रौशनी है ये गलत है । अरे आज तो पूरा शहर तिरंगामय हो जाना चाहिए ।
आज जब सुबह चौराहे पर कुछ कम से गया था तो देखा कि एक रिक्सावाला अपने रिक्से के हंदले पर तिरंगा लगाये था यहाँ तक तो जाने दीजिये । मेरे घर जो कूड़ा लेने आता है उसने अपने ठेलिए पर अपने देश का झंडा लगा रखा था । लेकिन सड़क पर निकलती हुवी चमचमाती हुवी गाडियों पर मुझे कोई झंडा नहीं दिखा । आप कह सकते है कि देश भक्ति दिल से होती है दिखाने से नहीं, झन्डा लगाने से नहीं शायद आप सही हो । मै इतना ज्ञानी तो नहीं हू लेकिन एक बात तो जनता हू कि कही न कही कोई मानसिकता इस तरह जन्म ले रही है कि कुछ अजीब सा लग रहा है ।

चमकते चाँद पर रौशन तिरंगा

चमकते चाँद पर रौशन तिरंगा है निशानी ।
हमारे आन की सम्मान की है ये कहानी ॥
डगर कैसी भी हो चलता रहे, उड़ता रहेगा ।
इसी पर ही शहीदों ने लुटाई थी जवानी ॥
ये वो परचम है जो कि झुक सकता नहीं है ।
हमारा हौसला है वो जो रुक सकता नहीं है ॥
कही रुकता नहीं है कारवां तूफ़ान आने दो ।
समंदर है ये मचलेगा वो रुक सकता नहीं है।।
सिखाते है हमें चलना नहीं वो जानते है ये ।
कि हम तूफान सीनों में छुपा लेते है सारे ॥
जरुरत है कोई गंगा इधर से फिर उधर जाये ।
अगर तुम हो समझते तो समझ लो ये इशारे ..

Saturday, January 22, 2011

जब ढलती शाम सुहानी हो

जब ढलती शाम सुहानी हो , कोई मीरा दीवानी हो ।

जब थाल सजाया जाता हो , जयमाल उठाया जाता हो ॥

तब याद तुम्हारी आती है, तब याद तुम्हारी आती है ।

जब दीपक जलने वाला हो , हाथो में तुलसी माला हो ॥

कोई मूरत प्यारी प्यारी हो , जब पूजा कि तैयारी हो ।

तब याद तुम्हारी आती है, तब याद तुम्हारी आती है ।

जब सूरज जगने वाला हो , किरणों का रूप निराला हो ।।

जब कोयल कूक सुनाती है, जाने क्या कह कर जाती है।

तब याद तुम्हारी आती है, तब याद तुम्हारी आती है ।

जब सन्नाटा सा होता है, कोई छुप छुप कर रोता है ।

नैनो में मोती रहते है , ये सच है कुछ तो कहते है ॥

तब याद तुम्हारी आती है, तब याद तुम्हारी आती है ।

जब दूर कही कुछ बाते हो , रुक रुक कर जब बरसाते हो ।।

कुछ मेघ गगन में रहते हो , रुक रुक कर कुछ तो कहते हो ।

तब याद तुम्हारी आती है, तब याद तुम्हारी आती है । ।

Saturday, January 15, 2011

जिन्हें हम ढूढ़ते थे

जिन्हें हम ढूढ़ते थे, आज तक अपने खयालो में ।
वो कैसे मिल गए थे, कल मुझे दिन के उजालो में ॥
जिन्हें हम सोचते थे, वो मुझे कुछ तो कहेगे पर ।
वो उल्टा खुद हमे उलझा, गए अपने सवालो में ॥

अजब है बात कि अब, बात तो कुछ भी नहीं होती ।
है आँखों में गिले, बरसात पर कुछ भी नहीं होती ॥
वो आते है न जाते है, शिकायत भी करे किस से ।
कि भूले है ये दिन, हम रात तो कुछ भी नहीं होती ॥

कि वो एक दौर था, हम रोज मिलते थे कही पर अब ।
कि चाहो लाख पर, एक बार भी सूरत नहीं मिलती ॥
जिसे हम पूज लेते, सर झुकाते, चुप खड़े रहते ।
मगर अब ढूढ़ता हू, वो कही मूरत नहीं मिलती ॥

नज़र भी सामने होगी, सफ़र भी सामने होगा ।
नहीं मालूम था वो, सामने ही मुस्कराएगा ॥
फिजा महकी हुवी होगी , हवा बहकी हुवी होगी ।
नहीं मालूम था मुझको, कि वो अब फिर न आएगा ॥

मुझे मालूम है, ये चाँद तो उस आसमा का है । ।
सितारों में अकेला है, बताना क्या जरुरी है । ।
मुझे मालूम है छूना उसे एक ख्वाब है लेकिन ।
मिले या ना मिले ये सब जताना क्या जरुरी है ॥