Sunday, August 2, 2009

वो नाज़ुक

वो नाज़ुक फूल जिसको ढूढ़ते थे हम बहारो में ।
अभी नज़रे उठाई दिख गया वो उन कतारों में ॥
न हो मुझ पर यकी तो आईने से पूछ लो जाकर ।
अभी तक सुर्खी बाकी है हसी लव के किनारों में ॥
नज़ारा और क्या देखू नज़र भर उनको जो देखा ।
अब इससे और ज्यादा क्या हसी होगा नज़रो में ॥

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