Thursday, December 16, 2010

नयन दर्शन से पुलकित हैं

सुबह कि शांत आभा से कोई, मिलकर बताये तो ।
चहकते पंक्षियों का कुछ, चहकना भी सुनाये तो ॥
अगर इतना ही मुस्किल है, नज़र हो फेर कर बैठे ।
झुकी रहने दो इनको बस, कोई सूरत दिखाए तो ॥

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नयन दर्शन से पुलकित हैं, अधर कुछ कह नहीं पाए ।
ह्रदय से है नमन इस पल, कि ये पल भर ठहर जाये ॥
है कितनी शांत सी मूरत , या मंदिर का कोई दीपक ।
चमकता स्वर्ण सा मस्तक, कहा से हो इसे लाये ॥

सरलता से कई दिन तक, ये मौसम फिर यहाँ रहता ।
ह्रदय से कुछ कहा करते, जो सुन लेते सुना जाएँ ॥
भ्रमर क्यों गा रहा है, इस तरह सुर को भुला करके ।
मुझे भी देखना है अब, सुरीलापन दिखा जाये ॥

6 comments:

  1. बहुत सुन्दर!
    अच्छी कामनाएँ है!

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  2. आपकी यह सशक्त और सुन्दर रचना
    आज के चर्चा मंच पर सुशोभित की गई है!
    http://charchamanch.uchcharan.com/2010/12/375.html

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  3. सुन्दर अभिव्यक्ति - अच्छी पोस्ट , शुभकामनाएं । पढ़िए "खबरों की दुनियाँ"

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