Sunday, May 16, 2010

जुबां हिलती नहीं खामोश

जुबां हिलती नहीं खामोश लव कुछ कह नहीं पाते

मगर नज़रे झुकाने का बहाना ढूढ़ लेते है ॥

जहाँ मिलती कोई मूरत उसे हम पूज लेते है ।

की सिजदे का कोई हमतो बहाना दूढ़ लेते है ॥

किसे फुर्सत यहाँ मिलती है दिल से मुस्कुराने की ।

मगर हर वक़्त रोने का बहाना ढूढ़ लेते है ॥

तमन्ना है जिन्हें उस दौर का थोडा मज़ा ले ले ।

कि हम तो मुसुकुराने का बहाना ढूढ़ लेते है ॥

नज़र मिलती नहीं फिर भी नज़र सब देखती तो है

जो देखा था कभी हम वो ज़माना ढूढ़ लेते है ॥

ये दरिया है नहीं रूकती रवानी बढती जाती है ।

मगर हम है अपना आशियानां ढूढ़ लेते है ॥

कही तूफान रुख न मोड़ दे अपने सफीने का ।

कि हम तो बस अभी से आबोदाना ढूढ़ लेते है ॥

Saturday, May 8, 2010

जो रूठो तो मनाने कि

जो रूठो तो मनाने कि अदा लावो तो अच्छा है ।

रहो तुम पास दिल के दूर ना जावो तो अच्छा है ॥

कि कितनी मुश्किलो से आ गए हो इस तरफ यू ही ।

ना फिर यू लौट कर जावो 'अनिल' आवो तो अच्छा है ॥

फिकर मुझको नहीं अपनी फ़क़त अफ़सोस इतना है ।

कि फिर से आते -आते दूर ना जावो तो अच्छा है ॥

Saturday, May 1, 2010

दुनिया में दो ऐसी चीजे है

दुनिया में दो ऐसी चीजे है जिसके लिए इन्सान सब कुछ कर सकता है । एक तो आसू और दूसरी मुस्कान । आप जिसको रोते हुए नहीं देख सकते उसके आसू रोकने के लिए सब कुछ कर सकते है और उसके होठो कि एक मुस्कान के लिए दुनिया के सारे गम अपने सीने में समेट लेते है । जब कभी मै कोई फिल्म देखता तो हर बार यही कहता कि ये प्यार को छोड़ कर कोई दूसरी फिल्मे क्यूँ नहीं बनाते हर फिल्म में एक हीरो ,एक हिरोइन और पूरी फिल्म में विलेन के हाथो पिटता हीरो । फिर मैंने सोचा कि कुछ तो बात होगी इस प्यार शब्द में तभी पूरी दुनिया इसी का नाम लेती है । मेरे दिमाग में भी एक जुगनू चमका और मैंने तय किया क्यों न मै इसका एक सर्वे कर लू ।

सबसे पहले मैंने एक किसान से डरते डरते पूछा कि भैया ये प्यार क्या होता है । उसने अपने लहलहाते खेतो कि तरफ अपनी चमकती नजरो से देखा और कहा यही मेरा प्यार है । मुझे कुछ समझ में नहीं आया लेकिन मैं हां कह कर आगे बढ़ गया । आगे कुछ ही दूर बढ़ा था कि मुझे एक बाग दिखाई दिया मैंने सोचा कि लगे हाथ माली से भी मिल लू । माली से भी मैंने वही सवाल दोहराया कि प्यार क्या होता है । माली एक लम्बी साँस खीच कर बोला जब मैं दिन भर का थका हारा इन खिलखिलाते और महकते हुए फूलो को देखता हु तो मेरी सब थकान दूर हो जाती है । मेरे लिए तो यही मेरा प्यार है । इतना कह कर वो फूलो को फिर बड़े प्यार से निहारने लगा ।

भूख से तिलमिलाते एक भिखारी के पास से जब मै गुज़रा तो वह बोला भगवान् के नाम पर एक रोटी दे दो । मेरे पास रोटी तो थी नहीं सो मैंने उसे कुछ खरीद कर दे दिया । वह बड़े प्यार से उसे खाने लगा । मै आगे बढ़ गया । एकाएक मै फिर उस भिखारी के पास आया लौट आया और बोला कि बाबा ये प्यार क्या होता है । उसने तुरंत से पहले जवाब दिया कि रोटी प्यार होता है । वाह प्यार का एक रूप रोटी भी होता है ये पहली बार जाना ।

एक माँ का बच्चा बड़ी देर से नहीं मिल रहा था । माँ उसे बड़े देर से खोज रही थी और रो रही थी । थोड़ी देर बाद उसका बच्चा दौड़ता हुआ आया और माँ कि गोद में बैठ गया । माँ उसे जल्दी जल्दी चूमने लगी मुझे समझ में आ गया था कि ये प्यार होता है । एक और सर्वे के लिए आगे बढ़ा तो देखा कि एक पत्नी के लिए सरहद पर बैठे पति कि चिठ्ठी आई थी । उसने मुझे रोक कर कहा कि भैया जरा इस ख़त को पढ़ दो। जब मै ख़त को पढ़ रहा था तो मुझे आसूं आ गए । मुझे समझ में आ गया था कि ये भी प्यार होता है ।


प्यार में कुछ लेना नहीं होता सिर्फ देना होता है धीरे धीरे समझ में आने लगा कि लोग क्यों बोलते है कि तुम्हारी ख़ुशी में ही मेरी ख़ुशी है। खैर आगे बढ़ा तो देखा कि एक लड़का बड़ी देर से सड़क के किनारे धुप में खड़ा था । मैंने कहा अरे दोस्त यहाँ क्यों खड़े हो पेड़ के नीचे खड़े हो जावो । वह बोला नहीं यार यहाँ से वो लड़की गुजरेगी जिस मै प्यार करता हूँ । वह निकलेगी तो मै एक बार उसे देख लूँगा । मैंने कहा अगर न निकली तो । वह बोला मै फिर भी यहाँ खड़ा रहूँगा । मै हँसते हुए आगे बढ़ गया और मै अपने आप से बोला अच्छा ये भी प्यार है ।

मेरी आखे धीरे धीरे खुल रही थी मुझे हर तरफ प्यार ही प्यार दिख रहा था । नदियाँ , झरने , पहाड़ , जंगल , गलियां , परिंदे सब मुझ पर हँस रहे थे । मै बड़े बुझे मन से से आगे बढ़ा और सोचने लगा कि मै किस चीज को खोज रहा था । अब तो जिधर देखता उधर सभी तरफ खिलखिलाता उछलता हुआ प्यार दिख रहा था । मुझे समझ में आया गया था कि प्यार और खूबसूरती देखने वाले के नजरो में होती है । ढूढने से भगवान् तो मिल जाता है पर प्यार पता नहीं । वक़्त बदलता है , दरिया अपना रास्ता बदलती है , पंक्षी अपना घोसला पर प्यार जैसा आज है वैसा कल रहेगा । ये वो दौलत है जो वक़्त के साथ बढ़ती रहती है ।

वो इंसान दुनिया का सबसे दौलतमंद इंसान होता है , जिसके पास प्यार होता है ये सब मै फिल्मो में सुना करता था लेकिन लहलहाते खेतो , महकते फूलो , कुंकती कोयलों , किसान के पसीने , चिलचिलाती धुप , कलकल करती नदिया , मदमस्त झरने और उडती जुल्फों ने प्यार कि परिभाषा अपने आप ही बता दी । अब क्या लिखू प्यार न तो समझने कि चीज है न ही सर्वे कि इसे तो सिर्फ महसूस किया जाता है ।

वैसे मैंने ये सब जो लिखा है वो प्यार के सागर कि एक छोटी सी बूंद है अगर आप कुछ कहना या लिखना या बताना चाहते है तो आपका स्वागत है । आप अपने विचार भी रख सकते है ।

Sunday, April 25, 2010

जब से इन्सान जज्बातों को समझने लगा है

जब से इन्सान जज्बातों को समझने लगा है तबसे उसकी परेसानिया और बढ गयी है । कभी वो हँसता है , कभी रोता है , कभी गाता है । कभी किसी बात को दिल से लगा लेता है और कभी किसी बात को हवा में उड़ा देता है । वैसे मुझे ये लेख लिखने नहीं आते फिर भी कोशिश करने में क्या हर्ज़ है । अगर कोई अपने आप को रोते हुए आईने में देख ले तो वो कभी नहीं रोयेगा क्योकि जो लाखो करोड़ो का नुकसान उन मोतियों से होता है उससे देश में फिर से आर्थिक मंदी आ सकती है और चेहरा खराब होता है वो अलग । आप को पता है चांदनी रात में समुन्दर कि लहरे खिलखिलाती हुई जब उछलती है तो ऐसा लगता है कि वो अभी चाँद को चूम लेगी लेकिन वो फिर जमीं पर गिर पड़ती है और फिर से दुगनी ताकत से बढती है और लगातार चाँद को छूने कि कोशिश करती है ।

बचपन में मुझे एक कविता पढाई गयी थी जिसमे बताया गया था कि जब सूरज निकलता है तो कमल खिलता है और उसके डूबते ही कमल मुरझा जाता है । मै हमेशा ये सोचा करता कि लाखो ,करोड़ो मील दूर सूरज से कमल का क्या लेना देना । ये उलझन अभी ख़तम नहीं हुई कि एक और कविता आ गयी जिसमे टीचर जी ने बताया कि कुमोदिनी (एक फूल जो पानी में होता है ) चाँद के निकलने का इंतजार करती है और चाँद के निकलते ही वो मुसुकुरा कर खिल उठती है । मेरी एक और मुसीबत बढ गयी कि ये चाँद और सूरज क्या क्या गुल खिलाते है ।खैर चाँद के बारे में बहुत सुना था कि वो हमारी धरती का ही एक हिस्सा है लेकिन एक जगह किसी को ये कहते हुए सुना कि कि कोई चाँद जैसा खुबसूरत है मै और परेशान और मै किसी से कुछ पूछ भी नहीं सकता कि ये क्या है ।

शाहजहाँ ने मुमताज़ के लिए एक ताजमहल बनवा दिया । किसी को रहने के लिए छत नसीब नहीं होती तो कोई मरने के बात भी ताजमहल में जिंदा रहता है । मेरे ख्याल हमेशा अलग रहते थे । फिर एक बार ताजमहल देखने का मौका मिला मै और मैंने देखा वाकई ताज महल बहुत खुबसूरत है। मै अपनी फिलोसफी थोड़ी देर के लिए भूल गया । वक़्त गुज़रता गया और सब कुछ वैसा ही रहा कुछ भी नहीं बदला चाँद का डूबना सूरज का निकलना सब कुछ, हां बदला तो मेरे सोचने का तरीका । मेरी समझ में आ चुका था ये सब और कुछ नहीं जज़्बात है जो इंसान को कमज़ोर और ताकतवर बनाते है । लेकिन मुझे सीखने को भी मिला कि जब प्रकृति अपने नियम नहीं बदलती तो हम क्यों । आदते भी वही बदली जाती है जो ख़राब होती है । अच्छी आदतों को तो सीने से लगा कर रखा जाता है ।

कोई कुछ भी कहे तो क्या हम हसना छोड़ देगे , जीना छोड़ देगे , अपने को बादल देगे ये तो गलत है । मेरी आदतों से किसी नुकसान न पहुचे और क्या । अगर मै लेखक होता तो दो चार मुहावरे , दोहे लिखता तो ये एक लेख हो जाता । हम सब अपनी ज़िन्दगी का सबसे कीमती वक़्त एक साथ बिता रहे है । सुबह घर से निकलना , रात में घर पहुचना और सुबह फिर वही । जिंदगी एक चलती फिरती मशीन हो गयी । कोई परेशान होता है तो कोई किसी को देख कर परेशां होता है । इतनी भाग दौड़ कि जिंदगी में सुक्र कीजिये कि अभी भी जज़्बात जिंदा है । वरना जज़्बात से अलग इंसान ही कहाँ जिंदा है।

कोई हँसना छोडना चाहता है तो कोई रोना । कोई हसने के लिए लाफिंग क्लब जाता है तो कोई रोने के लिए कमरे के अन्दर । अजीब दुनिया है । जिसके पास सब कुछ होता है डॉक्टर उससे न खाने के लिए कहते है और जिस के पास कुछ नहीं है उससे कहते है वो सब चीज़े खावो जो वो खरीद नहीं सकता ।

चलिए थोडा सा और लिख देता हूँ -
ये
दौलत मुसुकराने की बचावोगे तो कम होगी ।
नज़र जिस दम मिलावोगे नज़र है ये तो नम होगी ॥

आगे फिर कभी लिखेगे -----



Saturday, April 10, 2010

फिजा लेस्को खिज़ा लेस्को

फिजा लेस्को खिज़ा लेस्को जो पाई वो सजा लेस्को ।
सुबह लेस्को सहर लेस्को ज़रा रुक ले ठहर लेस्को ॥
ये तन लेस्को ये मन लेस्को ये हैरी का चमन लेस्को ।
ज़मी लेस्को गगन लेस्को मेरा तो प्राण मन लेस्को ॥
अनिल लेस्को कि निल लेस्को जो मिलते है वो दिल लेस्को ।
अज़ब लेस्को गज़ब लेस्को जो बोलो तो है सब लेस्को ॥
इधर लेस्को उधर लेस्को जो लम्बी वो डगर लेस्को।
जो धीरू दम दिखा देते तो रुक जाती डगर लेस्को ॥
जो लिख डाला वो ख़त लेस्को सिराज़ों का है मत लेस्को ।
ये डब्बा है बिना इंजन का ले डाला टिकेट लेस्को ॥
खता लेस्को पता लेस्को मै क्या कह दूं बता लेस्को ।
अगर दस्तक कोई देगा मेरे घर का पता लेस्को ॥
क्रमश :

तमन्ना फिर मेरी मचली कि

तमन्ना फिर मेरी मचली कि वो चिलमन उठा देते ।
ज़रा से लब खुले रखते ज़रा सा मुस्करा लेते ॥
कि कुछ जुल्फे बिखर जातीं तेरे रंगीन गालो पे ।
ज़रा नज़रे उठा कर मेरी नजरो से मिला लेते ॥
क़यामत कि फिकर किसको मुझे फिर होश में लावो ।
मेरे हाथों को अपने हाथ में कुछ दम उठा लेते ॥
यकी गर हो न तुमको आईने से पूछ लो जाकर ।
अगर तुम बोलने देती तो हम सब कुछ बता देते ॥


Friday, April 2, 2010

न जाने क्यूँ

ज़मी से आसमा तक हमने जब नज़रे उठाई है।
कई नजरो ने तब नज़रे चुराई थी न जाने क्यूँ ॥
मै अपने होश कि कुछ तो दवा करता मगर कैसे ।
ज़रा सा हौसला माँगा था मैंने उससे जाने क्यूँ ॥
कभी सीधे कदम पड़ते नहीं थे अपनी राहों पे ।
कि एक दम रुक था देर थक उस दम न जाने क्यूँ ॥
न जाने क्यूँ मेरी नज़रे उसे ही ढूढती रहती ।
कि उसका नाम लेने पर है कुछ होता न जाने क्यूँ ॥
न जाने क्यूँ मै अपने आप से कुछ बेखबर सा हूँ ।
मै उसकी हर खबर मालूम रखता हूँ न जाने क्यूँ ॥
खुदा मेरा सुकूं फिर से मुझे दे दे ये ख्वाहिस है ।
वो मेरी जिंदगी लेकर गयी है पर न जाने क्यूँ ।।
मुझे आदत नहीं है कुछ भी अपने पास रकने की ।
वो एक पल फिर ठहर जाये मैं चाहूँ पर न जाने क्यूँ ॥