Sunday, October 4, 2009

जो तुमने नज़रे उठा के देखा

जो तुमने नज़रे उठा के देखा ,
चमक सितारों की खो गई है ।
जो पल्लू उड़ के हटा बदन से ,
वो घडियां रगीन हो गई है ॥
न दिल है बस में न हम है बस में ,
चली क़यामत इधर किधर से ।
हुई है तूफ़ान जैसी हलचल ,
कदम पड़े है जिधर जिधर से ॥
ये चाँद सूरज है होठ तेरे ,
तपन से मुझको जला रहे है।
हमें नही कुछ भी ख्याल अपना ,
मगर वो हँसते ही जा रहे है ॥
निशां कदम के मै चूम आया ,
चुने है कांटे भी आज मैंने ।
हुए है दोनों ही हाथ घायल ,
न ज़ख्म देखे मगर किसी ने ॥
उन्हें ये जिद है की वो हसी है ,
तो हमने क्या कुछ ग़लत कहा है ।
तुम्हारे दीदार पर है जिंदा ,
वरना अब जिंदगी ही कहाँ है ॥

Friday, October 2, 2009

जब भी मै मुसीबतों

जब भी मै मुसीबतों से घिर जाता हूँ ।
तुमको देखता हूँ और मुस्कराता हूँ ॥
तुम लाख ना देखो मुझको ये अनिल ।
मगर मै हूँ की तुम्हे देखता जाता हूँ ॥
वक्त आता है चला जाता है चंद सांसे है गुजर जाने दो ।
ये तो खुशुबू है मत रोको इसको फिजावो में बिखर जाने दो

Sunday, September 27, 2009

यहाँ अब चंद लोगो के लिए

कई सारे वसीमो ने मुझे घर पर बुलाया था ।
बड़े ही नाज़ से उस नाजनी ने घर सजाया था ॥
बड़ी दुस्वारियो में कल वो मौका फिर गवां आया ।
बड़ी मुद्दत से जो मौका हमारे हाथ आया था ॥
मेरे पीछे कई लोगो ने कल मजमा लगाया था ।
कि जिस दम हमने आफिस को कदम अपना बढाया था ।।
मैं नज़रे फेर कर उस रस्ते को पार कर आया ।
मेरी खातिर जहाँ पर उसने ख़ुद दामन बिछाया था ॥
दिखा था चाँद रौशन चांदनी बिखरी मगर क्या है ।
उठाई थी नज़र मैंने कि कुछ उम्मीद होती है ।।
दशहरे की खुशी हम साथ मिल कर के मनायेगे ।
मगर अब चंद लोगो की यहाँ पर ईद होती है ॥

Friday, September 11, 2009

बड़ा अरमान था

बड़ा अरमान था मुझको की मै तुम पर ग़ज़ल लिख दू ।
खुली जुल्फे घटा कह दू गुलाबी लव कवल लिख दू ॥
बिठा लू सामने अपने करुँ कुछ गुफ्तगुं दिल की ।
बुला लू चांदनी रोशन तुम्हे जीनत महल लिख दू ॥
मगर तुम तो समंदर हो ग़ज़ल बनती बिगड़ती है ।
अब तुम पर क्या ग़ज़ल कह दू अब तुम पर क्या ग़ज़ल लिख दू ॥

Tuesday, September 8, 2009

ये कैसे आई लव पे लाली गुलाब की ।
क्या झुक गई थी लव पे डाली गुलाब की ।
जर्बान रुक गई अरे जब लव पे बल पड़े ।
माहेशिकस्त बन के वो छत पर निकल पड़े ।
हम बुत से बन गए है और बुत है चल पड़े
खालिश खलिश में पड़ गया गुलनार कौन है ।
शब् आखिरे में निकला सरकार कौन है ।
हर गाम चुस्त था फिर कैसे फिसल पड़े ।
माहेशिकस्त बन के वो छत पर निकल पड़े ।
हम बुत से बन गए है और बुत है चल पड़े ।

Sunday, August 2, 2009

वो नाज़ुक

वो नाज़ुक फूल जिसको ढूढ़ते थे हम बहारो में ।
अभी नज़रे उठाई दिख गया वो उन कतारों में ॥
न हो मुझ पर यकी तो आईने से पूछ लो जाकर ।
अभी तक सुर्खी बाकी है हसी लव के किनारों में ॥
नज़ारा और क्या देखू नज़र भर उनको जो देखा ।
अब इससे और ज्यादा क्या हसी होगा नज़रो में ॥

Sunday, July 26, 2009

बड़े अरमा

बड़े अरमां लिए दिल में उठे थे घर को जाने को ।
मगर अब हम बहुत बेताब है महफ़िल सजाने को ॥
बुघ्हे चेहरे नज़र मायूश लव खामोश है तो क्या ।
कही से ढूढ़ लायेगे हँसी चेहरा सजाने को ॥
कई नगमे , कई नज्मे , कई कौवालिया होगी ।
मगर अब हाथ उठेगे सिर्फ़ ताली बजाने को ॥